सोलर पैनल लगवाने से लंबे समय में बिजली का बिल कम हो सकता है, पर शुरुआती ख़र्च बड़ा होता है। इसलिए सोच-समझकर और कई जगह से जानकारी लेकर फ़ैसला करें।
सबसे पहले अपनी ज़रूरत समझें:
1. पिछले 6 से 12 महीनों के बिजली बिल देखें और औसत मासिक यूनिट निकालें।
2. मोटा अंदाज़ा: अच्छी धूप वाली जगह पर 1 किलोवाट का सिस्टम रोज़ लगभग 4 से 5 यूनिट बना सकता है। असली उत्पादन जगह, मौसम और छाया पर निर्भर करता है।
3. छत पर साफ़ और छाया-रहित जगह चाहिए। मोटे तौर पर 1 किलोवाट के लिए लगभग 10 वर्ग मीटर जगह लगती है।
मुख्य क़िस्में:
1. ऑन-ग्रिड: बिजली विभाग के मीटर से जुड़ा होता है। बैटरी नहीं लगती, इसलिए लागत कम रहती है, पर बिजली जाने पर यह चलना बंद हो सकता है।
2. ऑफ़-ग्रिड: बैटरी के साथ आता है। बिजली जाने पर भी चलता है, पर बैटरी का ख़र्च जुड़ता है।
3. हाइब्रिड: दोनों का मेल, पर कीमत ज़्यादा।
ख़रीदने से पहले ये जाँचें:
1. पैनल और इन्वर्टर की वारंटी, और कंपनी का सर्विस नेटवर्क।
2. पैनल की गुणवत्ता और इंस्टॉलर का अनुभव। कम से कम 2 से 3 जगह से कोटेशन लें।
3. सरकारी सब्सिडी योजनाओं की शर्तें और राशि समय के साथ बदलती रहती हैं। अपडेट जानकारी के लिए सरकारी पोर्टल या अपने बिजली विभाग से पुष्टि करें।
4. नेट मीटरिंग की प्रक्रिया और शुल्क पहले पूछ लें।
5. बिल में सब ख़र्च (पैनल, इन्वर्टर, तार, इंस्टॉलेशन, GST) अलग-अलग लिखवाएँ।
वापसी का हिसाब लगाएँ: कुल लागत को सालाना बचत से भाग देकर देखें कि कितने साल में पैसा वसूल होगा।
